रिश्ते 37

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रिश्तों का गणित
अनूठा होता है
जहाँ
बताना और जताना
गिनाना और दिखाना
बातचीत का केंद्र होते हैं
तराजू लिए लोग
नापने-तोलने में व्यस्त रहते हैं
और दूर बैठे रिश्ते
उन पर मुस्कराते हैं
उन पर तरस खाते हैं
और अपना पता बदल लेते हैं
रिश्ते केवल जीवित दिखाई देते हैं
उनमें जीवन होता नहीं है
रिश्ते अपनी गति अनुसार
नियमानुसार
चलते रहते हैं
निर्जीव

बहुत कठिन होता है

यह जानना
कौन किसका कितना है
मैं किसका कितना हूँ
क्या वो भी मेरा उतना है

उतना-कितना

मेरा-उसका
रिश्तों में दूरी लाते हैं

बिना किसी जीवन के
ऐसे रिश्ते चलते तो हैं
पर उनमें रुधिर सूखता जाता है
और हम रुक जाते हैं
रिश्ते चलते रहते हैं

कई बार हम भूल जाते हैं
कि यदि हमको कोई
छोटा दिखाई दे रहा है तो
या तो हम उसे बहुत
दूर से देख रहे होते हैं
या फिर
गुरूर से देख रहे होते हैं
थोड़ा पास जाइए
बैठिए, संभलिये, बात करिए
विस्तार समझिए
गणित से परे

क्षेत्रफल को जानिए
फिर निर्णय लीजिए
गुरूर को थूकिये फिर कहिए
कोई छोटा है या बड़ा
तलाश
रिश्तों में जीवन ढूँढने की

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